रग-रग में समा कर...
रग-रग में इस तरह से समा कर चले गये,
जैसे मुझ ही को मुझसे चुराकर चले गये,
आये थे मेरे दिल की प्यास बुझाने के वास्ते,
इक आग सी वो और लगा कर चले गये।
तुमने चाहा ही नहीं...
तुमने चाहा ही नहीं ये हालात बदल सकते थे,
तुम्हारे आँसू मेरी आँखों से भी निकल सकते थे,
तुम तो ठहरे रहे झील के पानी की तरह बस,


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